श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

तत्ते गतोऽस्म्यरणमद्य पदारविन्द-

मापन्‍नसंसृतिभयापहमार्तबन्धो।

एतावतालमलमिन्द्रियलालसेन

मर्त्यात्मदृक् त्वयि परे यदपत्यबुद्धिः॥ १९

tatte gato'smyaraṇamadya padāravinda-

māpannasaṃsṛtibhayāpahamārtabandho|

etāvatālamalamindriyalālasena

martyātmadṛk tvayi pare yadapatyabuddhiḥ|| 19

अर्थ

इसलिये दीनजनोंके हितैषी, शरणागतवत्सल! मैं अब तुम्हारे चरणकमलोंकी शरणमें हूँ; क्योंकि वे ही शरणागतोंके संसारभयको मिटानेवाले हैं। अब इन्द्रियोंकी लोलुपतासे भर पाया! इसीके कारण मैंने मृत्युके ग्रास इस शरीरमें आत्मबुद्धि कर ली और तुममें, जो कि परमात्मा हो, पुत्रबुद्धि॥ १९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें