परीक्षित्! दैत्यराज बलि बार-बार भगवान्के चरणकमलोंको अपने वक्षःस्थल और सिरपर रखने लगे, उनका हृदय प्रेमसे विह्वल हो गया। नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहने लगे। रोम-रोम खिल उठा। अब वे गद्गद स्वरसे भगवान्की स्तुति करने लगे॥ ३८॥
स इन्द्रसेनो भगवत्पदाम्बुजं
बिभ्रन्मुहुः प्रेमविभिन्नया धिया।
उवाच हानन्दजलाकुलेक्षणः
प्रहृष्टरोमा नृप गद्गदाक्षरम्॥ ३८
परीक्षित्! दैत्यराज बलि बार-बार भगवान्के चरणकमलोंको अपने वक्षःस्थल और सिरपर रखने लगे, उनका हृदय प्रेमसे विह्वल हो गया। नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहने लगे। रोम-रोम खिल उठा। अब वे गद्गद स्वरसे भगवान्की स्तुति करने लगे॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 657) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/85/38/