श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

स्वकृतपुरेष्वमीष्वबहिरन्तरसंवरणं ✎ 973

तव पुरुषं वदन्त्यखिलशक्तिधृतोंऽशकृतम्।

इति नृगतिं विविच्य कवयो निगमावपनं

भवत उपासतेऽङ्‌घ्रिमभवं भुवि विश्‍वसिताः॥ २०

svakṛtapureṣvamīṣvabahirantarasaṃvaraṇaṃ

tava puruṣaṃ vadantyakhilaśaktidhṛtoṃ'śakṛtam|

iti nṛgatiṃ vivicya kavayo nigamāvapanaṃ

bhavata upāsate'ṅghrimabhavaṃ bhuvi viśvasitāḥ|| 20

अर्थ

प्रभो! जीव जिन शरीरोंमें रहता है, वे उसके कर्मके द्वारा निर्मित होते हैं और वास्तवमें उन शरीरोंके कार्य-कारणरूप आवरणोंसे वह रहित है, क्योंकि वस्तुतः उन आवरणोंकी सत्ता ही नहीं है। तत्त्वज्ञानी पुरुष ऐसा कहते हैं कि समस्त शक्तियोंको धारण करनेवाले आपका ही वह स्वरूप है। स्वरूप होनेके कारण अंश न होनेपर भी उसे अंश कहते हैं और निर्मित न होनेपर भी निर्मित कहते हैं। इसीसे बुद्धिमान् पुरुष जीवके वास्तविक स्वरूपपर विचार करके परम विश्‍वासके साथ आपके चरणकमलोंकी उपासना करते हैं। क्योंकि आपके चरण ही समस्त वैदिक कर्मोंके समर्पणस्थान और मोक्षस्वरूप हैं*॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    त्वदंशस्य ममेशान त्वन्मायाकृतबन्धनम्।

    त्वदङ्‌घ्रिसेवामादिश्य परानन्द निवर्तय॥ ७॥

    मेरे परमानन्दस्वरूप स्वामी! मैं आपका अंश हूँ। अपने चरणोंकी सेवाका आदेश देकर अपनी मायाके द्वारा निर्मित मेरे बन्धनको निवृत्त कर दो॥ ७॥

    (मुद्रित पृष्ठ 674)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #973 शब्दोंके बीचका स्थान: स्वकृ तपुरेष्वमीष्वबहिरन्तरसंवरणं → स्वकृतपुरेष्वमीष्वबहिरन्तरसंवरणं

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