श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

तव परि ये चरन्त्यखिलसत्त्वनिकेततया

त उत पदाऽऽक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्ऋतेः।✎ 1443 1444

परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तां-

स्त्वयि कृतसौहृदाः खलु पुनन्ति न ये विमुखाः॥ २७

parivayase paśūniva girā vibudhānapi tāṃ-

stvayi kṛtasauhṛdāḥ khalu punanti na ye vimukhāḥ|| 27

अर्थ

भगवन्! जो लोग यह समझते हैं कि आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंके अधिष्ठान हैं, सबके आधार हैं और सर्वात्मभावसे आपका भजन-सेवन करते हैं, वे मृत्युको तुच्छ समझकर उसके सिरपर लात मारते हैं अर्थात् उसपर विजय प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग आपसे विमुख हैं, वे चाहे जितने बड़े विद्वान् हों, उन्हें आप कर्मोंका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंसे पशुओंके समान बाँध लेते हैं। इसके विपरीत जिन्होंने आपके साथ प्रेमका सम्बन्ध जोड़ रखा है, वे न केवल अपनेको बल्कि दूसरोंको भी पवित्र कर देते हैं—जगत‍्के बन्धनसे छुड़ा देते हैं। ऐसा सौभाग्य भला, आपसे विमुख लोगोंको कैसे प्राप्त हो सकता है†॥ २७॥

टिप्पणियाँ

  1. †

    तपन्तु तापैः प्रपतन्तु पर्वतादटन्तु तीर्थानि पठन्तु चागमान्।

    यजन्तु यागैर्विवदन्‍तु वादैर्हरिं विना नैव मृतिं तरन्ति॥ १४॥

    लोग पंचाग्‍नि आदि तापोंसे तप्त हों, पर्वतसे गिरकर आत्मघात कर लें, तीर्थोंका पर्यटन करें, वेदोंका पाठ करें, यज्ञोंके द्वारा यजन करें अथवा भिन्‍न-भिन्‍न मतवादोंके द्वारा आपसमें विवाद करें, परन्तु भगवान्‌के बिना इस मृत्युमय संसार-सागरसे पार नहीं जाते।

    (मुद्रित पृष्ठ 677)

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