श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

स्थिरचरजातयः स्युरजयोत्थनिमित्तयुजो

विहर उदीक्षया यदि परस्य विमुक्त ततः।

न हि परमस्य कश्‍चिदपरो न परश्‍च भवेद्

वियत इवापदस्य तव शून्यतुलां दधतः॥ २९

sthiracarajātayaḥ syurajayotthanimittayujo

vihara udīkṣayā yadi parasya vimukta tataḥ|

na hi paramasya kaścidaparo na paraśca bhaved

viyata ivāpadasya tava śūnyatulāṃ dadhataḥ|| 29

अर्थ

नित्यमुक्त! आप मायातीत हैं, फिर भी जब अपने ईक्षणमात्रसे—संकल्पमात्रसे मायाके साथ क्रीडा करते हैं, तब आपका संकेत पाते ही जीवोंके सूक्ष्म शरीर और उनके सुप्त कर्म-संस्कार जग जाते हैं और चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। प्रभो! आप परम दयालु हैं। आकाशके समान सबमें सम होनेके कारण न तो कोई आपका अपना है और न तो पराया। वास्तवमें तो आपके स्वरूपमें मन और वाणीकी गति ही नहीं है। आपमें कार्य-कारणरूप प्रपंचका अभाव होनेसे बाह्य दृष्टिसे आप शून्यके समान ही जान पड़ते हैं; परन्तु उस दृष्टिके भी अधिष्ठान होनेके कारण आप परम सत्य हैं†॥ २९॥

टिप्पणियाँ

  1. †

    त्वदीक्षणवशक्षोभमायाबोधितकर्मभिः ।

    जातान् संसरतः खिन्‍नान्‍नृहरे पाहि नः पितः॥ १६॥

    नृसिंह! आपके सृष्टि-संकल्पसे क्षुब्ध होकर मायाने कर्मोंको जाग्रत् कर दिया है। उन्हींके कारण हम लोगोंका जन्म हुआ और अब आवागमनके चक्करमें भटककर हम दुःखी हो रहे हैं। पिताजी! आप हमारी रक्षा कीजिये।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 678)

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