श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

सैषा ह्युपनिषद् ब्राह्मी पूर्वेषां पूर्वजैर्धृता।

श्रद्धया धारयेद् यस्तां क्षेमं गच्छेदकिंचनः॥ ३

saiṣā hyupaniṣad brāhmī pūrveṣāṃ pūrvajairdhṛtā|

śraddhayā dhārayed yastāṃ kṣemaṃ gacchedakiṃcanaḥ|| 3

अर्थ

ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषद्का यही स्वरूप है। इसे पूर्वजोंके भी पूर्वज सनकादि ऋषियोंने आत्मनिश्‍चयके द्वारा धारण किया है। जो भी मनुष्य इसे श्रद्धापूर्वक धारण करता है, वह बन्धनके कारण समस्त उपाधियों—अनात्मभावोंसे मुक्त होकर अपने परम कल्याणस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है॥ ३॥

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