॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.87.40
त्वदवगमी न वेत्ति भवदुत्थशुभाशुभयो-
र्गुणविगुणान्वयांस्तर्हि देहभृतां च गिरः।
अनुयुगमन्वहं सगुण गीतपरम्परया
श्रवणभृतो यतस्त्वमपवर्गगतिर्मनुजैः॥ ४०
tvadavagamī na vetti bhavadutthaśubhāśubhayo-
rguṇaviguṇānvayāṃstarhi dehabhṛtāṃ ca giraḥ|
anuyugamanvahaṃ saguṇa gītaparamparayā
śravaṇabhṛto yatastvamapavargagatirmanujaiḥ|| 40
अर्थ
भगवन्! आपके वास्तविक स्वरूपको जाननेवाला पुरुष आपके दिये हुए पुण्य और पाप-कर्मोंके फल सुख एवं दुःखोंको नहीं जानता, नहीं भोगता; वह भोग्य और भोक्तापनके भावसे ऊपर उठ जाता है। उस समय विधि-निषेधके प्रतिपादक शास्त्र भी उससे निवृत्त हो जाते हैं; क्योंकि वे देहाभिमानियोंके लिये हैं। उनकी ओर तो उसका ध्यान ही नहीं जाता। जिसे आपके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ है, वह भी यदि प्रतिदिन आपकी प्रत्येक युगमें की हुई लीलाओं, गुणोंका गान सुन-सुनकर उनके द्वारा आपको अपने हृदयमें बैठा लेता है तो अनन्त, अचिन्त्य, दिव्यगुणगणोंके निवासस्थान प्रभो! आपका वह प्रेमी भक्त भी पाप-पुण्योंके फल सुख-दुःखों और विधि-निषेधोंसे अतीत हो जाता है। क्योंकि आप ही उनकी मोक्षस्वरूप गति हैं। (परन्तु इन ज्ञानी और प्रेमियोंको छोड़कर और सभी शास्त्र बन्धनमें हैं तथा वे उसका उल्लंघन करनेपर दुर्गतिको प्राप्त होते हैं)*॥ ४०॥
टिप्पणियाँ
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अवगमं तव मे दिशि माधव स्फुरति यन्न सुखासुखसंगमः।
श्रवणवर्णनभावमथापि वा न हि भवामि यथा विधिकिंकरः॥ २७॥
माधव! आप मुझे अपने स्वरूपका अनुभव कराइये, जिससे फिर सुख-दुःखके संयोगकी स्फूर्ति नहीं होती। अथवा मुझे अपने गुणोंके श्रवण और वर्णनका प्रेम ही दीजिये, जिससे कि मैं विधि-निषेधका किंकर न होऊँ।