श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.87.49

दशम स्कन्ध · अध्याय 87 · अथ सप्ताशीतितमोऽध्यायः

इत्येतद् वर्णितं राजन् यन्‍नः प्रश्‍नः कृतस्त्वया।

यथा ब्रह्मण्यनिर्देश्ये निर्गुणेऽपि मनश्‍चरेत्॥ ४९

ityetad varṇitaṃ rājan yannaḥ praśnaḥ kṛtastvayā|

yathā brahmaṇyanirdeśye nirguṇe'pi manaścaret|| 49

अर्थ

राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें बतलाया कि मन-वाणीसे अगोचर और समस्त प्राकृत गुणोंसे रहित परब्रह्म परमात्माका वर्णन श्रुतियाँ किस प्रकार करती हैं और उसमें मनका कैसे प्रवेश होता है? यही तो तुम्हारा प्रश्‍न था॥ ४९॥

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