श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं ब्रुवाणे वैकुण्ठे भृगु३स्तन्मन्द्रया गिरा।

निर्वृतस्तर्पितस्तूष्णीं भक्त्युत्कण्ठोऽश्रुलोचनः॥ १३

evaṃ bruvāṇe vaikuṇṭhe bhṛgustanmandrayā girā|

nirvṛtastarpitastūṣṇīṃ bhaktyutkaṇṭho'śrulocanaḥ|| 13

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब भगवान्‌ने अत्यन्त गम्भीर वाणीसे इस प्रकार कहा, तब भृगुजी परम सुखी और तृप्त हो गये। भक्तिके उद्रेकसे उनका गला भर आया, आँखोंमें आँसू छलक आये और वे चुप हो गये॥ १३॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    गुस्तं सान्द्रया।

    (मुद्रित पृष्ठ 694)

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