श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.52

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

द्वारेण चक्रानुपथेन तत्तमः

परं१ परं ज्योतिरनन्तपारम्।

समश्‍नुवानं प्रसमीक्ष्य फाल्गुनः

प्रताडिताक्षोपिदधेऽक्षिणी उभे॥ ५२

dvāreṇa cakrānupathena tattamaḥ

paraṃ paraṃ jyotiranantapāram|

samaśnuvānaṃ prasamīkṣya phālgunaḥ

pratāḍitākṣopidadhe'kṣiṇī ubhe|| 52

अर्थ

इस प्रकार सुदर्शन चक्रके द्वारा बतलाये हुए मार्गसे चलकर रथ अन्धकारकी अन्तिम सीमापर पहुँचा। उस अन्धकारके पार सर्वश्रेष्ठ पारावाररहित व्यापक परम ज्योति जगमगा रही थी। उसे देखकर अर्जुनकी आँखें चौंधिया गयीं और उन्होंने विवश होकर अपने नेत्र बंद कर लिये॥ ५२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    परात्परं।

    (मुद्रित पृष्ठ 698)

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