श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.55

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

ददर्श तद्भोगसुखासनं विभुं

महानुभावं पुरुषोत्तमोत्तमम्।

सान्द्राम्बुदाभं सुपिशंगवाससं

प्रसन्‍नवक्त्रं रुचिरायतेक्षणम्॥ ५५

dadarśa tadbhogasukhāsanaṃ vibhuṃ

mahānubhāvaṃ puruṣottamottamam|

sāndrāmbudābhaṃ supiśaṃgavāsasaṃ

prasannavaktraṃ rucirāyatekṣaṇam|| 55

अर्थ

परीक्षित्! अर्जुनने देखा कि शेषभगवान्‌की सुखमयी शय्यापर सर्वव्यापक महान् प्रभावशाली परम पुरुषोत्तम भगवान् विराजमान हैं। उनके शरीरकी कान्ति वर्षाकालीन मेघके समान श्यामल है। अत्यन्त सुन्दर पीला वस्त्र धारण किये हुए हैं। मुखपर प्रसन्‍नता खेल रही है और बड़े-बड़े नेत्र बहुत ही सुहावने लगते हैं॥ ५५॥

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