श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

नैच्छत्त्वमस्युत्पथग इति देवश्‍चुकोप ह।

शूलमुद्यम्य तं हन्तुमारेभे तिग्मलोचनः॥ ६

naicchattvamasyutpathaga iti devaścukopa ha|

śūlamudyamya taṃ hantumārebhe tigmalocanaḥ|| 6

अर्थ

परन्तु महर्षि भृगुने उनसे आलिंगन करना स्वीकार न किया और कहा—‘तुम लोक और वेदकी मर्यादाका उल्लंघन करते हो, इसलिये मैं तुमसे नहीं मिलता।’ भृगुजीकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर क्रोधके मारे तिलमिला उठे। उनकी आँखें चढ़ गयीं। उन्होंने त्रिशूल उठाकर महर्षि भृगुको मारना चाहा॥ ६॥

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