श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.63

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

निशाम्य वैष्णवं धाम पार्थः परमविस्मितः।

यत्किंचित् पौरुषं पुंसां मेने कृष्णानुकम्पितम्॥ ६३

niśāmya vaiṣṇavaṃ dhāma pārthaḥ paramavismitaḥ|

yatkiṃcit pauruṣaṃ puṃsāṃ mene kṛṣṇānukampitam|| 63

अर्थ

भगवान् विष्णुके उस परमधामको देखकर अर्जुनके आश्‍चर्यकी सीमा न रही। उन्होंने ऐसा अनुभव किया कि जीवोंमें जो कुछ बल-पौरुष है, वह सब भगवान् श्रीकृष्णकी ही कृपाका फल है॥ ६३॥

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