श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.1.15

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

शतधन्वा ततस्तस्य भविता तद् बृहद्रथः।

मौर्या ह्येते दश नृपाः सप्तत्रिंशच्छतोत्तरम्।

समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कलौ कुरुकुलोद्वह॥ १५

śatadhanvā tatastasya bhavitā tad bṛhadrathaḥ|

mauryā hyete daśa nṛpāḥ saptatriṃśacchatottaram|

samā bhokṣyanti pṛthivīṃ kalau kurukulodvaha|| 15

अर्थ

सोमशर्माका शतधन्वा और शतधन्वाका पुत्र बृहद्रथ होगा। कुरुवंशविभूषण परीक्षित्! मौर्यवंशके ये दस* नरपति कलियुगमें एक सौ सैंतीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे। बृहद्रथका सेनापति होगा पुष्यमित्र शुंग। वह अपने स्वामीको मारकर स्वयं राजा बन बैठेगा। पुष्यमित्रका अग्‍निमित्र और अग्‍निमित्रका सुज्येष्ठ होगा॥ १५-१६॥

यह अर्थ श्लोक 15–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. *

    मौर्योंकी संख्या चन्द्रगुप्तको मिलाकर नौ ही होती है। विष्णुपुराणादिमें चन्द्रगुप्तसे पाँचवें दशरथ नामके एक और मौर्यवंशी राजाका उल्लेख मिलता है। उसीको लेकर यहाँ दस संख्या समझनी चाहिये।

    (मुद्रित पृष्ठ 908)

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