श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.1

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अथ दशमोऽध्यायः

मार्कण्डेयजीको भगवान् शंकरका वरदान

सूत उवाच

स एवमनुभूयेदं नारायणविनिर्मितम्।

वैभवं योगमायायास्तमेव शरणं ययौ॥ १

sa evamanubhūyedaṃ nārāyaṇavinirmitam|

vaibhavaṃ yogamāyāyāstameva śaraṇaṃ yayau|| 1

अर्थ

सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! मार्कण्डेय मुनिने इस प्रकार नारायण-निर्मित योगमाया-वैभवका अनुभव किया। अब यह निश्‍चय करके कि इस मायासे मुक्त होनेके लिये मायापति भगवान्‌की शरण ही एकमात्र उपाय है, उन्हींकी शरणमें स्थित हो गये॥ १॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें