श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.11

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

आत्मन्यपि शिवं प्राप्तं तडित्पिंगजटाधरम्।

त्र्यक्षं१ दशभुजं प्रांशुमुद्यन्तमिव भास्करम्॥ ११✎ 2156

ātmanyapi śivaṃ prāptaṃ taḍitpiṃgajaṭādharam|

tryakṣaṃ daśabhujaṃ prāṃśumudyantamiva bhāskaram|| 11

अर्थ

मार्कण्डेय मुनिने देखा कि उनके हृदयमें तो भगवान् शंकरके दर्शन हो रहे हैं। शंकरजीके सिरपर बिजलीके समान चमकीली पीली-पीली जटाएँ शोभायमान हो रही हैं। तीन नेत्र हैं और दस भुजाएँ। लम्बा-तगड़ा शरीर उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी है॥ ११॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    त्र्यक्षमष्टभुजम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 960)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2156 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): त्रॺक्षं → त्र्यक्षं

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