श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.13

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

बिभ्राणं सहसा भातं विचक्ष्य हृदि विस्मितः।

किमिदं कुत एवेति समाधेर्विरतो मुनिः॥ १३

bibhrāṇaṃ sahasā bhātaṃ vicakṣya hṛdi vismitaḥ|

kimidaṃ kuta eveti samādhervirato muniḥ|| 13

अर्थ

मार्कण्डेय मुनि अपने हृदयमें अकस्मात् भगवान् शंकरका यह रूप देखकर विस्मित हो गये। ‘यह क्या है? कहाँसे आया?’ इस प्रकारकी वृत्तियोंका उदय हो जानेसे उन्होंने अपनी समाधि खोल दी॥ १३॥

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