श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.15

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

तस्मै४ सपर्यां व्यदधात् सगणाय सहोमया।

स्वागतासनपाद्यार्घ्यगन्धस्रग्धूपदीपकैः॥ १५

tasmai saparyāṃ vyadadhāt sagaṇāya sahomayā|

svāgatāsanapādyārghyagandhasragdhūpadīpakaiḥ|| 15

अर्थ

तदनन्तर मार्कण्डेय मुनिने स्वागत, आसन, पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, पुष्पमाला, धूप और दीप आदि उपचारोंसे भगवान् शंकर, भगवती पार्वती और उनके गणोंकी पूजा की॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्राचीन प्रतिमें ‘तस्मै......सहोमया’ इस श्‍लोकार्धके स्थानमें ‘विमुच्यात्मसमाधानं तपसा नियमैर्यमैः’ ऐसा पाठ है। इसके सिवा वर्तमान प्रतिमें जो २५वीं संख्याका ‘श्रवणाद्दर्शना.......किन्‍नु सम्भाषणादिभिः’ यह श्‍लोक है। इसको वहाँ न पढ़कर यहाँ ही (‘विमुच्या.....यमैः’ इसके बाद) पढ़ा गया है। इसके पश्‍चात् ‘स्वागतासन......’ इत्यादि श्‍लोकोंका पाठ है।

    (मुद्रित पृष्ठ 960)

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