श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.17

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

नमः शिवाय शान्ताय५ सत्त्वाय प्रमृडाय च।✎ 977

रजोजुषेऽप्यघोराय नमस्तुभ्यं तमोजुषे॥ १७

namaḥ śivāya śāntāya sattvāya pramṛḍāya ca|

rajojuṣe'pyaghorāya namastubhyaṃ tamojuṣe|| 17

अर्थ

मैं आपके त्रिगुणातीत सदाशिव स्वरूपको और सत्त्वगुणसे युक्त शान्त-स्वरूपको नमस्कार करता हूँ। मैं आपके रजोगुणयुक्त सर्वप्रवर्तकस्वरूप एवं तमोगुणयुक्त अघोरस्वरूपको नमस्कार करता हूँ’॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. ५

    देवाय नित्याय प्रमृ०।

    (मुद्रित पृष्ठ 960)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #977 शब्दोंके बीचका स्थान: प्रमृडायच। → प्रमृडाय च।

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