श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.23

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवाश्‍चेतनोज्झिताः।

ते पुनन्त्युरुकालेन यूयं दर्शनमात्रतः॥ २३

na hyammayāni tīrthāni na devāścetanojjhitāḥ|

te punantyurukālena yūyaṃ darśanamātrataḥ|| 23

अर्थ

मार्कण्डेयजी! केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं होते तथा केवल जड मूर्तियाँ ही देवता नहीं होतीं। सबसे बड़े तीर्थ और देवता तो तुम्हारे-जैसे संत हैं; क्योंकि वे तीर्थ और देवता बहुत दिनोंमें पवित्र करते हैं, परन्तु तुमलोग दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देते हो॥ २३॥

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