श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.25

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

श्रवणाद् दर्शनाद् वापि महापातकिनोऽपि वः।

शुध्येरन्‍नन्त्यजाश्‍चापि किमु सम्भाषणादिभिः॥ २५

śravaṇād darśanād vāpi mahāpātakino'pi vaḥ|

śudhyerannantyajāścāpi kimu sambhāṣaṇādibhiḥ|| 25

अर्थ

मार्कण्डेयजी! बड़े-बड़े महापापी और अन्त्यज भी तुम्हारे-जैसे महापुरुषोंके चरित्रश्रवण और दर्शनसे ही शुद्ध हो जाते हैं; फिर वे तुमलोगोंके सम्भाषण और सहवास आदिसे शुद्ध हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है॥ २५॥

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