मार्कण्डेयजीने कहा—सचमुच सर्वशक्तिमान् भगवान्की यह लीला सभी प्राणियोंकी समझके परे है। भला, देखो तो सही—ये सारे जगत्के स्वामी होकर भी अपने अधीन रहनेवाले मेरे-जैसे जीवोंकी वन्दना और स्तुति करते हैं॥ २८॥
अहो ईश्वरलीलेयं दुर्विभाव्या शरीरिणाम्।
यन्नमन्तीशितव्यानि स्तुवन्ति जगदीश्वराः॥ २८
मार्कण्डेयजीने कहा—सचमुच सर्वशक्तिमान् भगवान्की यह लीला सभी प्राणियोंकी समझके परे है। भला, देखो तो सही—ये सारे जगत्के स्वामी होकर भी अपने अधीन रहनेवाले मेरे-जैसे जीवोंकी वन्दना और स्तुति करते हैं॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 962) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/28/