श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.34

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

वरमेकं वृणेऽथापि पूर्णात् कामाभिवर्षणात्।

भगवत्यच्युतां भक्तिं तत्परेषु तथा त्वयि॥ ३४

varamekaṃ vṛṇe'thāpi pūrṇāt kāmābhivarṣaṇāt|

bhagavatyacyutāṃ bhaktiṃ tatpareṣu tathā tvayi|| 34

अर्थ

आप स्वयं तो पूर्ण हैं ही, अपने भक्तोंकी भी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। इसलिये मैं आपका दर्शन प्राप्त कर लेनेपर भी एक वर और माँगता हूँ। वह यह कि भगवान्‌में, उनके शरणागत भक्तोंमें और आपमें मेरी अविचल भक्ति सदा-सर्वदा बनी रहे॥ ३४॥

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