श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.1

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अथैकादशोऽध्यायः

भगवान्‌के अंग, उपांग और आयुधोंका रहस्य तथा विभिन्‍न सूर्यगणोंका वर्णन

शौनक उवाच

अथेममर्थं पृच्छामो भवन्तं बहुवित्तमम्।

समस्ततन्त्रराद्धान्ते भवान् भागवततत्त्ववित्॥ १

athemamarthaṃ pṛcchāmo bhavantaṃ bahuvittamam|

samastatantrarāddhānte bhavān bhāgavatatattvavit|| 1

अर्थ

शौनकजीने कहा—सूतजी! आप भगवान्‌के परमभक्त और बहुज्ञोंमें शिरोमणि हैं। हमलोग समस्त शास्त्रोंके सिद्धान्तके सम्बन्धमें आपसे एक विशेष प्रश्‍न पूछना चाहते हैं, क्योंकि आप उसके मर्मज्ञ हैं॥ १॥

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