सूर्यमण्डल अथवा अग्निमण्डल ही भगवान्की पूजाका स्थान है, अन्तःकरणकी शुद्धि ही मन्त्रदीक्षा है और अपने समस्त पापोंको नष्ट कर देना ही भगवान्की पूजा है॥ १७॥
मण्डलं देवयजनं दीक्षा संस्कार आत्मनः।
परिचर्या भगवत आत्मनो दुरितक्षयः॥ १७
सूर्यमण्डल अथवा अग्निमण्डल ही भगवान्की पूजाका स्थान है, अन्तःकरणकी शुद्धि ही मन्त्रदीक्षा है और अपने समस्त पापोंको नष्ट कर देना ही भगवान्की पूजा है॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.11.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 966) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/11/17/