श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.19

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

आतपत्रं तु वैकुण्ठं द्विजा धामाकुतोभयम्।

त्रिवृद्वेदः सुपर्णाख्यो यज्ञं वहति पूरुषम्॥ १९

ātapatraṃ tu vaikuṇṭhaṃ dvijā dhāmākutobhayam|

trivṛdvedaḥ suparṇākhyo yajñaṃ vahati pūruṣam|| 19

अर्थ

ब्राह्मणो! समग्र ऐश्‍वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य—इन छः पदार्थोंका नाम ही लीला-कमल है, जिसे भगवान् अपने करकमलमें धारण करते हैं। धर्म और यशको क्रमशः चँवर एवं व्यजन (पंखे) के रूपसे तथा अपने निर्भय धाम वैकुण्ठको छत्ररूपसे धारण किये हुए हैं। तीनों वेदोंका ही नाम गरुड है। वे ही अन्तर्यामी परमात्माका वहन करते हैं॥ १८-१९॥

यह अर्थ श्लोक 18–19 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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