ये सूर्यदेव अपने छः गणोंके साथ बारहों महीने सर्वत्र विचरते रहते हैं और इस लोक तथा परलोकमें विवेक-बुद्धिका विस्तार करते हैं॥ ४६॥✎ 1861
द्वादशस्वपि मासेषु देवोऽसौ षड्भिरस्य वै।
चरन् समन्तात्तनुते परत्रेह च सन्मतिम्॥ ४६
ये सूर्यदेव अपने छः गणोंके साथ बारहों महीने सर्वत्र विचरते रहते हैं और इस लोक तथा परलोकमें विवेक-बुद्धिका विस्तार करते हैं॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.11.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 969) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/11/46/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)