नागगण रस्सीकी तरह उनके रथको कसे रहते हैं। यक्षगण रथका साज सजाते हैं और बलवान् राक्षस उसे पीछेसे ढकेलते हैं॥ ४८॥
उन्नह्यन्ति रथं नागा ग्रामण्यो रथयोजकाः।
चोदयन्ति रथं पृष्ठे नैर्ऋता बलशालिनः॥ ४८
नागगण रस्सीकी तरह उनके रथको कसे रहते हैं। यक्षगण रथका साज सजाते हैं और बलवान् राक्षस उसे पीछेसे ढकेलते हैं॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.11.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 969) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/11/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1249 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ता → नैऋर्ऋता
#1250 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ऋता → नैर्ऋता