श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.12.46

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

पतितः स्खलितश्‍चार्तः क्षुत्त्वा वा विवशो ब्रुवन्।

हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात्॥ ४६

patitaḥ skhalitaścārtaḥ kṣuttvā vā vivaśo bruvan|

haraye nama ityuccairmucyate sarvapātakāt|| 46

अर्थ

जो मनुष्य गिरते-पड़ते, फिसलते, दुःख भोगते अथवा छींकते समय विवशतासे भी ऊँचे स्वरसे बोल उठता है—‘हरये नमः’, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें