श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.12.53

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यशःश्रियामेव परिश्रमः परो

वर्णाश्रमाचारतपःश्रुतादिषु ।

अविस्मृतिः श्रीधरपादपद्मयो-

र्गुणानुवादश्रवणादिभिर्हरेः ॥ ५३

yaśaḥśriyāmeva pariśramaḥ paro

varṇāśramācāratapaḥśrutādiṣu |

avismṛtiḥ śrīdharapādapadmayo-

rguṇānuvādaśravaṇādibhirhareḥ || 53

अर्थ

वर्णाश्रमके अनुकूल आचरण, तपस्या और अध्ययन आदिके लिये जो बहुत बड़ा परिश्रम किया जाता है, उसका फल है—केवल यश अथवा लक्ष्मीकी प्राप्ति। परन्तु भगवान्‌के गुण, लीला, नाम आदिका श्रवण, कीर्तन आदि तो उनके श्रीचरणकमलोंकी अविचल स्मृति प्रदान करता है॥ ५३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें