॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.13.2
पृष्ठे भ्राम्यदमन्दमन्दरगिरिग्रावाग्रकण्डूयना-
न्निद्रालोः कमठाकृतेर्भगवतः श्वासानिलाः पान्तु वः।
यत्संस्कारकलानुवर्तनवशाद् वेलानिभेनाम्भसां
यातायातमतन्द्रितं जलनिधेर्नाद्यापि विश्राम्यति॥ २
pṛṣṭhe bhrāmyadamandamandaragirigrāvāgrakaṇḍūyanā-
nnidrāloḥ kamaṭhākṛterbhagavataḥ śvāsānilāḥ pāntu vaḥ|
yatsaṃskārakalānuvartanavaśād velānibhenāmbhasāṃ
yātāyātamatandritaṃ jalanidhernādyāpi viśrāmyati|| 2
अर्थ
जिस समय भगवान्ने कच्छपरूप धारण किया था और उनकी पीठपर बड़ा भारी मन्दराचल मथानीकी तरह घूम रहा था, उस समय मन्दराचलकी चट्टानोंकी नोकसे खुजलानेके कारण भगवान्को तनिक सुख मिला। वे सो गये और श्वासकी गति तनिक बढ़ गयी। उस समय उस श्वासवायुसे जो समुद्रके जलको धक्का लगा था, उसका संस्कार आज भी उसमें शेष है। आज भी समुद्र उसी श्वासवायुके थपेड़ोंके फलस्वरूप ज्वार-भाटोंके रूपमें दिन-रात चढ़ता-उतरता रहता है, उसे अबतक विश्राम न मिला। भगवान्की वही परमप्रभावशाली श्वासवायु आपलोगोंकी रक्षा करे॥ २॥