श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.2.14

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

शूद्रप्रायेषु वर्णेषु छागप्रायासु धेनुषु।

गृहप्रायेष्वाश्रमेषु यौनप्रायेषु बन्धुषु॥ १४

śūdraprāyeṣu varṇeṣu chāgaprāyāsu dhenuṣu|

gṛhaprāyeṣvāśrameṣu yaunaprāyeṣu bandhuṣu|| 14

अर्थ

चारों वर्णोंके लोग शूद्रोंके समान हो जायँगे। गौएँ बकरियोंकी तरह छोटी-छोटी और कम दूध देनेवाली हो जायँगी। वानप्रस्थी और संन्यासी आदि विरक्त आश्रमवाले भी घर-गृहस्थी जुटाकर गृहस्थोंका-सा व्यापार करने लगेंगे। जिनसे वैवाहिक सम्बन्ध है, उन्हींको अपना सम्बन्धी माना जायगा॥ १४॥

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