श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.2.4

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

लिंगमेवाश्रमख्यातावन्योन्यापत्तिकारणम्।

अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं पाण्डित्ये चापलं वचः॥ ४

liṃgamevāśramakhyātāvanyonyāpattikāraṇam|

avṛttyā nyāyadaurbalyaṃ pāṇḍitye cāpalaṃ vacaḥ|| 4

अर्थ

वस्त्र, दण्ड-कमण्डलु आदिसे ही ब्रह्मचारी, संन्यासी आदि आश्रमियोंकी पहचान होगी और एक-दूसरेका चिह्न स्वीकार कर लेना ही एकसे दूसरे आश्रममें प्रवेशका स्वरूप होगा। जो घूस देने या धन खर्च करनेमें असमर्थ होगा, उसे अदालतोंसे ठीक-ठीक न्याय न मिल सकेगा। जो बोलचालमें जितना चालाक होगा, उसे उतना ही बड़ा पण्डित माना जायगा॥ ४॥

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