परीक्षित्! धर्मके समान अधर्मके भी चार चरण हैं—असत्य, हिंसा, असन्तोष और कलह। त्रेतायुगमें इनके प्रभावसे धीरे-धीरे धर्मके सत्य आदि चरणोंका चतुर्थांश क्षीण हो जाता है॥ २०॥
त्रेतायां धर्मपादानां तुर्यांशो हीयते शनैः।
अधर्मपादैरनृतहिंसासन्तोषविग्रहैः ॥ २०
परीक्षित्! धर्मके समान अधर्मके भी चार चरण हैं—असत्य, हिंसा, असन्तोष और कलह। त्रेतायुगमें इनके प्रभावसे धीरे-धीरे धर्मके सत्य आदि चरणोंका चतुर्थांश क्षीण हो जाता है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.3.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 919) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/3/20/