श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.30

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यदा मायानृतं तन्द्रा निद्रा हिंसा विषादनम्।

शोको मोहो भयं दैन्यं स कलिस्तामसः स्मृतः॥ ३०

yadā māyānṛtaṃ tandrā nidrā hiṃsā viṣādanam|

śoko moho bhayaṃ dainyaṃ sa kalistāmasaḥ smṛtaḥ|| 30

अर्थ

जिस समय झूठ-कपट, तन्द्रा-निद्रा, हिंसा-विषाद, शोक-मोह, भय और दीनताकी प्रधानता हो, उसे तमोगुण-प्रधान कलियुग समझना चाहिये॥ ३०॥✎ 1453

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1453 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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