श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.32

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

दस्यूत्कृष्टा जनपदा वेदाः पाखण्डदूषिताः।

राजानश्‍च प्रजाभक्षाः शिश्‍नोदरपरा द्विजाः॥ ३२

dasyūtkṛṣṭā janapadā vedāḥ pākhaṇḍadūṣitāḥ|

rājānaśca prajābhakṣāḥ śiśnodaraparā dvijāḥ|| 32

अर्थ

सारे देशमें, गाँव-गाँवमें लुटेरोंकी प्रधानता एवं प्रचुरता हो जाती है। पाखण्डी लोग अपने नये-नये मत चलाकर मनमाने ढंगसे वेदोंका तात्पर्य निकालने लगते हैं और इस प्रकार उन्हें कलंकित करते हैं। राजा कहलानेवाले लोग प्रजाकी सारी कमाई हड़पकर उन्हें चूसने लगते हैं। ब्राह्मणनामधारी जीव पेट भरने और जननेन्द्रियको तृप्त करनेमें ही लग जाते हैं॥ ३२॥✎ 1454

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1454 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हैें॥ → हैं॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें