श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.38

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

शूद्राः प्रतिग्रहीष्यन्ति तपोवेषोपजीविनः।

धर्मं वक्ष्यन्त्यधर्मज्ञा अधिरुह्योत्तमासनम्॥ ३८

śūdrāḥ pratigrahīṣyanti tapoveṣopajīvinaḥ|

dharmaṃ vakṣyantyadharmajñā adhiruhyottamāsanam|| 38

अर्थ

शूद्र तपस्वियोंका वेष बनाकर अपना पेट भरते और दान लेने लगते हैं। जिन्हें धर्मका रत्तीभर भी ज्ञान नहीं है, वे ऊँचे सिंहासनपर विराजमान होकर धर्मका उपदेश करने लगते हैं॥ ३८॥

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