श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.23

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

बुद्धीन्द्रियार्थरूपेण ज्ञानं भाति तदाश्रयम्।

दृश्यत्वाव्यतिरेकाभ्यामाद्यन्तवदवस्तु यत्॥ २३

buddhīndriyārtharūpeṇa jñānaṃ bhāti tadāśrayam|

dṛśyatvāvyatirekābhyāmādyantavadavastu yat|| 23

अर्थ

परीक्षित्! (अब आत्यन्तिक प्रलय अर्थात् मोक्षका स्वरूप बतलाया जाता है।) बुद्धि, इन्द्रिय और उनके विषयोंके रूपमें उनका अधिष्ठान, ज्ञानस्वरूप वस्तु ही भासित हो रही है। उन सबका तो आदि भी है और अन्त भी। इसलिये वे सब सत्य नहीं हैं। वे दृश्य हैं और अपने अधिष्ठानसे भिन्‍न उनकी सत्ता भी नहीं है। इसलिये वे सर्वथा मिथ्या—मायामात्र हैं॥ २३॥

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