॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.4.26
यथा जलधरा व्योम्नि भवन्ति न भवन्ति च।
ब्रह्मणीदं तथा विश्वमवयव्युदयाप्ययात्॥ २६
yathā jaladharā vyomni bhavanti na bhavanti ca|
brahmaṇīdaṃ tathā viśvamavayavyudayāpyayāt|| 26
अर्थ
यह विश्व उत्पत्ति और प्रलयसे ग्रस्त है, इसलिये अनेक अवयवोंका समूह अवयवी है। अतः यह कभी ब्रह्ममें होता है और कभी नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे आकाशमें मेघमाला कभी होती है और कभी नहीं होती॥ २६॥