श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.28

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यत् सामान्यविशेषाभ्यामुपलभ्येत स भ्रमः।

अन्योन्यापाश्रयात् सर्वमाद्यन्तवदवस्तु यत्॥ २८

yat sāmānyaviśeṣābhyāmupalabhyeta sa bhramaḥ|

anyonyāpāśrayāt sarvamādyantavadavastu yat|| 28

अर्थ

परन्तु ब्रह्ममें यह कार्य-कारणभाव भी वास्तविक नहीं है। क्योंकि देखो, कारण तो सामान्य वस्तु है और कार्य विशेष वस्तु। इस प्रकारका जो भेद दिखायी देता है, वह केवल भ्रम ही है। इसका हेतु यह है कि सामान्य और विशेष भाव आपेक्षिक हैं, अन्योन्याश्रित हैं। विशेषके बिना सामान्य और सामान्यके बिना विशेषकी स्थिति नहीं हो सकती। कार्य और कारणभावका आदि और अन्त दोनों ही मिलते हैं, इसलिये भी वह स्वाप्निक भेद-भावके समान सर्वथा अवस्तु है॥ २८॥

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