श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.31

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यथा हिरण्यं बहुधा समीयते१

नृभिः क्रियाभिर्व्यवहारवर्त्मसु।

एवं वचोभिर्भगवानधोक्षजो

व्याख्यायते लौकिकवैदिकैर्जनैः॥ ३१

yathā hiraṇyaṃ bahudhā samīyate

nṛbhiḥ kriyābhirvyavahāravartmasu|

evaṃ vacobhirbhagavānadhokṣajo

vyākhyāyate laukikavaidikairjanaiḥ|| 31

अर्थ

जैसे व्यवहारमें मनुष्य एक ही सोनेको अनेकों रूपोंमें गढ़-गलाकर तैयार कर लेते हैं और वह कंगन, कुण्डल, कड़ा आदि अनेकों रूपोंमें मिलता है; इसी प्रकार व्यवहारमें निपुण विद्वान् लौकिक और वैदिक वाणीके द्वारा इन्द्रियातीत आत्मस्वरूप भगवान्‌का भी अनेकों रूपोंमें वर्णन करते हैं॥ ३१॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रतीयते।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 928)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें