श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.8

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

क्षयं यास्यन्ति शनकैः कालेनोपद्रुताः प्रजाः।

सामुद्रं दैहिकं भौमं रसं सांवर्तको रविः॥ ८

kṣayaṃ yāsyanti śanakaiḥ kālenopadrutāḥ prajāḥ|

sāmudraṃ daihikaṃ bhaumaṃ rasaṃ sāṃvartako raviḥ|| 8

अर्थ

इस प्रकार कालके उपद्रवसे पीड़ित होकर धीरे-धीरे सारी प्रजा क्षीण हो जाती है। प्रलयकालीन सांवर्तक सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणोंसे समुद्र, प्राणियोंके शरीर और पृथ्वीका सारा रस खींच-खींचकर सोख जाते हैं और फिर उन्हें सदाकी भाँति पृथ्वीपर बरसाते नहीं। उस समय संकर्षणभगवान्‌के मुखसे प्रलयकालीन संवर्तक अग्‍नि प्रकट होती है॥ ८-९॥

यह अर्थ श्लोक 8–9 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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