श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.5.7

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

स्नेहाधिष्ठानवर्त्यग्‍निसंयोगो यावदीयते।

ततो दीपस्य दीपत्वमेवं देहकृतो भवः।

रजःसत्त्वतमोवृत्त्या जायतेऽथ विनश्यति॥ ७

snehādhiṣṭhānavartyagnisaṃyogo yāvadīyate|

tato dīpasya dīpatvamevaṃ dehakṛto bhavaḥ|

rajaḥsattvatamovṛttyā jāyate'tha vinaśyati|| 7

अर्थ

जबतक तेल, तेल रखनेका पात्र, बत्ती और आगका संयोग रहता है, तभीतक दीपकमें दीपकपना है; वैसे ही उनके ही समान जबतक आत्माका कर्म, मन, शरीर और इनमें रहनेवाले चैतन्याध्यासके साथ सम्बन्ध रहता है तभीतक उसे जन्म-मृत्युके चक्र संसारमें भटकना पड़ता है और रजोगुण, सत्त्वगुण तथा तमोगुणकी वृत्तियोंसे उसे उत्पन्‍न, स्थित एवं विनष्ट होना पड़ता है॥ ७॥

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