शौनकादि ऋषियो! मुनिकुमार शृंगीने क्रोधित होकर परीक्षित्को शाप दे दिया था। अब उनका भेजा हुआ तक्षक सर्प राजा परीक्षित्को डसनेके लिये उनके पास चला। रास्तेमें उसने कश्यप नामके एक ब्राह्मणको देखा॥ ११॥✎ 14551456
तक्षकः प्रहितो विप्राः क्रुद्धेन द्विजसूनुना।
हन्तुकामो नृपं गच्छन् ददर्श पथि कश्यपम्॥ ११
शौनकादि ऋषियो! मुनिकुमार शृंगीने क्रोधित होकर परीक्षित्को शाप दे दिया था। अब उनका भेजा हुआ तक्षक सर्प राजा परीक्षित्को डसनेके लिये उनके पास चला। रास्तेमें उसने कश्यप नामके एक ब्राह्मणको देखा॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 934) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/6/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1455 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पराक्षित्को → परीक्षित्को
#1456 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पराक्षित्को → परीक्षित्को