श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.24

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नैष त्वया मनुष्येन्द्र वधमर्हति सर्पराट्।

अनेन पीतममृतमथ वा अजरामरः॥ २४

naiṣa tvayā manuṣyendra vadhamarhati sarparāṭ|

anena pītamamṛtamatha vā ajarāmaraḥ|| 24

अर्थ

‘नरेन्द्र! सर्पराज तक्षकको मार डालना आपके योग्य काम नहीं है। यह अमृत पी चुका है। इसलिये यह अजर और अमर है॥ २४॥

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