श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.31

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

न यत्र सृज्यं सृजतोभयोः परं

श्रेयश्‍च जीवस्त्रिभिरन्वितस्त्वहम्।

तदेतदुत्सादितबाध्यबाधकं

निषिध्य चोर्मीन् विरमेत् स्वयं मुनिः॥ ३१

na yatra sṛjyaṃ sṛjatobhayoḥ paraṃ

śreyaśca jīvastribhiranvitastvaham|

tadetadutsāditabādhyabādhakaṃ

niṣidhya cormīn viramet svayaṃ muniḥ|| 31

अर्थ

कर्म, उसके सम्पादनकी सामग्री और उनके द्वारा साध्यकर्म—इन तीनोंसे अन्वित अहंकारात्मक जीव—यह सब जिसमें नहीं हैं, वह आत्म-स्वरूप परमात्मा न तो कभी किसीके द्वारा बाधित होता है और न तो किसीका विरोधी ही है। जो पुरुष उस परमपदके स्वरूपका विचार करता है, वह मनकी मायामयी लहरों, अहंकार आदिका बाध करके स्वयं अपने आत्मस्वरूपमें विहार करने लगता है॥ ३१॥

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