श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.33

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

त एतदधिगच्छन्ति विष्णोर्यत् परमं पदम्।

अहं ममेति दौर्जन्यं न येषां देहगेहजम्॥ ३३

ta etadadhigacchanti viṣṇoryat paramaṃ padam|

ahaṃ mameti daurjanyaṃ na yeṣāṃ dehagehajam|| 33

अर्थ

विष्णुभगवान्‌का यही वास्तविक स्वरूप है, यही उनका परमपद है। इसकी प्राप्ति उन्हीं लोगोंको होती है, जिनके अन्तःकरणमें शरीरके प्रति अहंभाव नहीं है और न तो इसके सम्बन्धी गृह आदि पदार्थोंमें ममता ही। सचमुच जगत‍्की वस्तुओंमें मैंपन और मेरेपनका आरोप बहुत बड़ी दुर्जनता है॥ ३३॥

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