श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.40

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

शृणोति य इमं स्फोटं सुप्तश्रोत्रे च शून्यदृक्।

येन वाग् व्यज्यते यस्य व्यक्तिराकाश आत्मनः॥ ४०

śṛṇoti ya imaṃ sphoṭaṃ suptaśrotre ca śūnyadṛk|

yena vāg vyajyate yasya vyaktirākāśa ātmanaḥ|| 40

अर्थ

जब श्रवणेन्द्रियकी शक्ति लुप्त हो जाती है, तब भी इस ॐकारको—समस्त अर्थोंको प्रकाशित करनेवाले स्फोट तत्त्वको जो सुनता है और सुषुप्ति एवं समाधि-अवस्थाओंमें सबके अभावको भी जानता है, वही परमात्माका विशुद्ध स्वरूप है। वही ॐकार परमात्मासे हृदयाकाशमें प्रकट होकर वेदरूपा वाणीको अभिव्यक्त करता है॥ ४०॥

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