श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.45

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

पुत्रानध्यापयत्तांस्तु ब्रह्मर्षीन् ब्रह्मकोविदान्।

ते तु धर्मोपदेष्टारः स्वपुत्रेभ्यः समादिशन्॥ ४५

putrānadhyāpayattāṃstu brahmarṣīn brahmakovidān|

te tu dharmopadeṣṭāraḥ svaputrebhyaḥ samādiśan|| 45

अर्थ

उसी वर्णमालाद्वारा उन्होंने अपने चार मुखोंसे होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा—इन चार ऋत्विजोंके कर्म बतलानेके लिये ॐकार और व्याहृतियोंके सहित चार वेद प्रकट किये और अपने पुत्र ब्रह्मर्षि मरीचि आदिको वेदाध्ययनमें कुशल देखकर उन्हें वेदोंकी शिक्षा दी। वे सभी जब धर्मका उपदेश करनेमें निपुण हो गये, तब उन्होंने अपने पुत्रोंको उनका अध्ययन कराया॥ ४४-४५॥

यह अर्थ श्लोक 44–45 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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