श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.51

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तासां स चतुरः शिष्यानुपाहूय महामतिः।

एकैकां संहितां ब्रह्मन्‍नेकैकस्मै ददौ विभुः॥ ५१

tāsāṃ sa caturaḥ śiṣyānupāhūya mahāmatiḥ|

ekaikāṃ saṃhitāṃ brahmannekaikasmai dadau vibhuḥ|| 51

अर्थ

जैसे मणियोंके समूहमेंसे विभिन्‍न जातिकी मणियाँ छाँटकर अलग-अलग कर दी जाती हैं, वैसे ही महामति भगवान् व्यासदेवने मन्त्र-समुदायमेंसे भिन्‍न-भिन्‍न प्रकरणोंके अनुसार मन्त्रोंका संग्रह करके उनसे ऋग्, यजुः, साम और अथर्व—ये चार संहिताएँ बनायीं और अपने चार शिष्योंको बुलाकर प्रत्येकको एक-एक संहिताकी शिक्षा दी॥ ५०-५१॥

यह अर्थ श्लोक 50–51 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें